एक हसीन गलती..?
नमस्कार दोस्तो, मै महेश कुमार फिर से आप लोगो के लिये एक नयी कहानी लेकर आया हुँ। उम्मीद है पहले की कहानी के जैसे ही इसको भी आपका भरपुर प्यार मिलेगा।
आपने मेरी पिछली कहानी में मेरे और रेखा भाभी के सम्बन्धों के बारे में तो पढ़ा, अब ये उसके आगे का एक नया वाकिया लिख रहा हूँ उम्मीद है यह कहानी भी आपको पसन्द आयेगी।
कहानी शुरु करने से पहले मै बता देना चाहता हुँ की मेरी पहले की कहानी की तरह इस कहानी मे भी बस आपको सैक्स ही पढने को मिलेगा और वो सैक्स क्यो हुवा, कैसे हुवा और किस तरह से हुवा इसके अलावा और कुछ नही मिलेगा। अगर आपको ये अच्छा लगे तो काॅमेन्टस बोक्स मे तारीफ करना और अच्छा ना लगे तो अपने किमती सुझाव देना।
चलो अब ज्यादा समय ना लेते मै कहानी पर आता हुँ, पर कहानी शुरु करने से पहले, जैसा की मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ मेरी सभी कहानियाँ काल्पनिक हैं जिनका किसी से भी कोई सम्बन्ध नहीं है अगर होता भी है तो यह मात्र एक संयोग ही होगा।
जैसा की आपने मेरी पिछली कहानी (रेखा भाभी)मे पढा होगा गाँव मे मेरे और रेखा भाभी के सम्बन्ध बन गये थे। इसके बाद मैं छुट्टियां खत्म होने तक करीब डेढ़ महीने गाँव में ही रहा और वही रेखा भाभी के साथ मजे करता रहा…
मेरी अब छुट्टियाँ समाप्त हो गई थी इसलिए मैं वापस अपने घर आ गया। मैं घर आया तब तक मेरे भैया भी छुट्टियाँ समाप्त करके अपनी ड्यूटी पर जा चुके थे इसलिये मैं अब फिर से अपनी पायल भाभी के साथ उनके कमरे में ही सोने लगा और मेरे व भाभी के सम्बन्ध बनना फिर से चालू हो गये।
मुझे गाँव से आये हुए अभी दस दिन ही हुए थे की एक शाम जब मैं बाहर से घर आया तो देखा ड्राईंगरूम में रामेसर चाचा जी बैठे हुए थे।
अब रामेसर चाचा को अचानक घर मे बैठा देख मैं थोड़ा डर सा गया, कहीं उनको मेरे और रेखा भाभी के बारे में पता तो नहीं चल गया और वो उसी की शिकायत करने के लिये यहाँ आये हों..?
खैर मैं उनके चरण स्पर्श करके अब सीधा अन्दर चला गया और जब अन्दर गया तो देखा, सुमन दीदी (रामेसर चाचा जी की बेटी) भी आई हुई थी, बाद में मुझे पता चला की सुमन दीदी को नौकरी के लिये कोई परीक्षा देनी थी, उसी के लिये रामेसर चाचा सुमन दीदी को शहर लेकर आये हैं।
सुमन दीदी की परीक्षा अगले दिन होनी थी इसलिये वो दोनों उस रात हमारे घर पर ही रहे। अगले दिन परीक्षा के बाद वो जाना चाहते थे मगर मेरे मम्मी पापा ने सुमन दीदी को हमारे घर कुछ दिन रुकने के लिये कहा।
वैसे तो सुमन दीदी की अभी छुट्टियाँ ही चल रही थी मगर वो अपने कपड़े लेकर नहीं आई थी इसलिए वो मना कर रही थी। अब इसके लिये मेरी मम्मी ने उन्हें पायल भाभी के कपड़े पहनने का रास्ता बता दिया और आखिरकार सुमन दीदी को कुछ दिन रोक ही लिया गया।
सुमन दीदी के रूकने से मेरे सभी घरवाले तो खुश थे मगर इसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा, क्योंकि सुमन दीदी अब मेरी भाभी के साथ उनके कमरे में ही सोने लगी और मुझे फिर से अपना बिस्तर ड्राईंगरूम में लगाना पड़ गया।
सुमन दीदी के आ जाने से मुझे अब अपना बिस्तर तो लगाना ही पङा, साथ ही मेरे और मेरी भाभी के सम्बन्ध भी बनना बन्द हो गये। हमारे सम्बन्ध बस अब चूमने चाटने और लिपटने तक ही सीमित होकर रह गये थे, और वो भी तभी होता जब भाभी रात को घर का मुख्य दरवाजा बन्द करने के लिये ड्राईंगरूम से होकर आती जाती।
दरअसल हमारे घर का मुख्य दरवाजा मेरी भाभी ही खोलती और बन्द करती थी। क्योंकि रात को घर के सब काम निपटा कर सबसे आखिर में मेरी भाभी ही सोती थी.. और सुबह जब दूधवाला आता तो दूध लेने के लिये सबसे पहले वो ही उठकर दरवाजा खोलती भी थी।
अब दरवाजा खोलने के लिये उन्हें ड्राईंगरूम से तो होकर गुजरना पड़ता ही था। इसलिये मैं भी उन्हें कभी कभी वहीं पर पकड़ लेता था। मगर अब तो भाभी उसके लिये भी मना करने लगी, क्योंकि एक बार जब मैंने भाभी को ड्राईंगरूम में पकड़ रखा था तो अचानक से सुमन दीदी वहाँ आ गयी थी।
सुमन दीदी ने कुछ देखा या नही देखा ये तो नही पता मगर उसको हमारे सम्बन्धों का अब शक जरुर गया था, क्योंकि वो हम दोनों पर अब नजर सी रखने लगी थी।
इसके लिये सुमन दीदी किसी से कुछ कहती तो नही थी मगर मै और मेरी भाभी जब कभी कोई बात या हँसी मजाक करते तो वो चोर निगाहो से बस हमे ही देखने का प्रयास करती, पर जाहिर ऐसा करती जैसे कि उसे कुछ पता ही नहीं…?
मेरे दिन अब ऐसे ही गुजर रहे थे की एक रात घर मे बिजली नहीं थी। मेर घर तो क्या उस दिन काफी जोरो से आँधी और बारिश होने के कारण लगभग पूरे शहर की ही बिजली गुल थी।
बिजली ना होने के कारण उस रात घर मे सब ने जल्दी खाना खा लिया। खाना खाने के बाद अब मेरे मम्मी पापा तो अपने कमरे मे जाकर सो गये थे मगर मेरी भाभी व सुमन दीदी घर के काम निपटान रही थी।
बिजली के बिना पूरे घर में ही अन्धेरा था, बस मोमबत्ती की रोशनी से ही काम चल रहा था। मैं मोमबत्ती की रोशनी में अब पढ़ाई तो कर नहीं सकता था। इसलिये खाना खाने के बाद मै भी ड्राईंगरूम में आकर लेट गया।
मुझे अब नीँद तो आ नही रही थी इसलिये मै लेटे लेटे अपनी भाभी के बारे मे ही सोच रहा था की तभी घर के अन्दर की तरफ से ड्राईँगरुम के अन्दर कोई आया और बाहर की तरफ चला गया।
वैसे ड्राईंगरूम में तो इतना अन्धेरा था की बस बाहर से आने वाली रोशनी से दोनों तरफ के दरवाजे ही दिख रहे थे बाकी सब अन्धेरा ही अन्धेरा था मगर फिर भी मै समझ गया की ये भाभी है जो घर का मैन गेट बन्द करने गयी है।
मै अब भाभी के बारे मे तो सोच ही रहा था, तभी मेरे शैतानी दिमाग में एक योजना भी आ गयी। दरअसल मैं अब सोचने लगा की आज चारों तरफ तो अन्धेरा है ही और ड्राईंगरूम में तो कुछ दिखाई देना भी मुश्किल है इसलिये क्यों ना आज इस अन्धेरे का ही फायदा उठा लिया जाये…
अब ये बात मेरे दिमाग मे आते ही मैने भी मौके का फायदा उठाने की सोची और तुरन्त बिस्तर से उठकर खड़ा हो गया। बिस्तर से उठकर मै अब बाहर से आने वाले दरवाजे पीछे जाकर खङा हो गया और भाभी के वापस आने का इन्तजार करने लगा…
मुझे ज्यादा इन्तजार नही करना पङा, और जैसे ही भाभी घर का मुख्य दरवाजा बन्द करके ड्राईंगरूम के अन्दर आई, मैंने उन्हें वही पकड़ लिया और उनकी गर्दन व गालों पर चुम्बनों की झड़ी सी लगा दी।
अब अन्धेरे में हुवे इस अचानक हमले से वैसे ही भाभी सकपका गई थी उपर से जब तक वो कुछ समझ पाती, तब तक मैने उनके होठो को अपने मुँह मे भर लिया… भाभी ने अब अपनी गर्दन को भी घुमाने की भी कोशिश की मगर मै दोनो हाथो से उनकी गर्दन को पकड़कर उनके होंठों को जोरो से चुशता ही चला गया…
भाभी तो डर के मारे जैसे अब जङ ही हो गयी। उसे कुछ देर तो समझ ही नही आया की वो क्या करे…?बस हल्का हल्का कसमसाते हुवे मुझे धकेला सा रही थी। वो मेरा विरोध तो नहीं कर रही थी मगर फिर भी डरी डरी सी हल्का हल्का कसमसा रही थी।
भाभी के होंठों को चुशते हुवे तब तक मैने अपना एक हाथ भी अब उनके सुट मे भी घुसा दिया और उनके उनके पेट को सहलाते हुए धीरे धीरे उरोजों की तरफ बढना शुरु कर दिया…
भाभी का पूरा बदन अब तो जैसे काँप ही गया, पता नहीं उन्हें ये कंपकपी डर के कारण हो रही थी या फ़िर उत्तेजना के कारण, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। उन्होने मेरे हाथ को रोकने के लिये अब पकड़ना तो चाहा मगर तब तक मेरा हाथ उनके उरोजों तक पहुँच गया…
सुट के नीचे हमेशा की तरह ही भाभी ने ब्रा पहन रखी थी इसलिये मैंने ब्रा के उपर से ही उनकी एक चुँची को पकङ लिये और हल्के हाथ से धीरे धीरे उसे मसलना शुरु कर दिया...पर ये क्या उनकी चुँची मुझे कुछ छोटी व काफी कसी हुए से महसूस हुई…
और फिर तभी मेरे दिमाग में बिजली की तरह एक सवाल सा कौन्ध गया…
“कही यह सुमन दीदी तो नहीं….?”
जैसा की आपने पढा बिजली ना होने के कारण मैने अन्धेरे का फायदा उठाकर अपनी भाभी को पकङ लिया था मगर जैसे ही मैने उनकी चुँचियो को हाथ लगाया मुझे उनकी चुँचियाँ कुछ छोटी व मेरी भाभी के मुकाबले काफी कसी हुई सी महसूस हुई..
तभी मेरे दिमाग मेये सवाल कौँध गया की कही ये सुमन दीदी तो नही..? क्योंकि आज मुझे भाभी का व्यवहार भी कुछ अजीब ही लग रहा था, पहले जब कभी मैं भाभी को चुमता था तो वो हमेशा मेरा साथ देती थी मगर आज वो साथ देने की बजाय कसमसा रही थी और काफी घबरा भी रही थी।
मेरे दिमाग अब ये बात आते ही मैं बुरी तरह घबरा गया…! मेरा हाथ अब जहाँ था वहीं के वहीं रूक गया तो मेरे होठो ने भी उनके होठो को चुशना बन्द कर दिया….
मेरी भाभी की व सुमन दीदी की लम्बाई एक समान ही थी और उस दिन दोनों ने ही सलवार सूट पहन रखा था इसलिये अन्धेरे में मैं पहचान नहीं सका कि ये मेरी भाभी है या सुमन दीदी…?
चलो मैंने तो गलती से सुमन दीदी को पकड़ लिया था।
पर सुमन दीदी….?
सुमन दीदी भी तो कुछ बोल नहीं रही थी। मेरा तो ठीक है पर वो तो बोल सकती थी..?
पर शायद सुमन दीदी इस वजह से शर्मा रही थी की, अगर वो कुछ कहेगी तो मैं ये, जान जाऊँगा की उसे मेरे और मेरी भाभी के सम्बन्धों के बारे में पता है और उस दिन उन्होने मुझे व भाभी को देख लिया था…
वैसे भी सुमन दीदी बहुत डरपोक तो थी ही, उपर से मैने उन्हे कुछ बोलने का मौका भी तो कहाँ दिया था.? जब से उन्हे पकङा था तब से ही मै उनके होठो को चुशे ही जा रहा था…?
सुमन दीदी अभी भी वैसे ही मेरी बाँहो मे कसमसा सी रही थी। मुझे पता तो चल गया था की ये पायल भाभी नही बल्कि सुमन दीदी है मगर फिर मै अब कोई फैसला नही कर पा रहा था की सुमन दीदी को छोड़ दूँ या फिर पकड़े रहूँ?
क्योंकी इतना सब करने के बाद मैं अब अगर उनको छोड़ देता हुँ तो वो भी समझ जायेगी की मैंने उन्हे क्यों छोड़ दिया, और नही छोङु तो करु क्या..? सुमन दीदी के जैसी ही स्थिति में अब मै भी फँस गय था…?
इस असमंजस की स्थिति के बीच, पता नही क्यो ये जानकर की, ये मेरी भाभी नही बल्की सुमन दीदी है और डर व शरम के कारण वो कुछ बोल नहीं रही, तो बहुत ही रोमाँचित सा भी लग रहा था।
मेरे दिमाग में अब एक साथ अनेक विचारों का भूचाल सा मच रहा था और रह रह कर सुमन दीदी के प्रति मेरी वासना सी भी जोर मारने लगी थी।
दरअसल मैं अब सोच रहा था कि अगर सुमन दीदी डर व शरम की वजह से कुछ बोल नहीं रही है तो क्यों ना मैं अब इसी बात का फायदा ही उठा लूँ…?
अब सुमन दीदी को पकङे पकङे मै कुछ देर तो ऐसे ही खङा रहा, फिर आखिरकार वासना मेरे विचारों पर भारी पड़ गयी और अपने आप ही मेरे हाथों की पकड़ सुमन दीदी के चुँची पर फिर से कसती चली गई।
सुमन दीदी के होंठों को भी मैने अब फिर से चुशना शुरु कर दिया था मगर पहले के चुशने मे और अब मे थोङा अन्तर था। अबकी बार मै उनको थोङे प्यार से चुश रहा था जिसका सुमन दीदी विरोध तो नहीं कर रही थी मगर अब भी वैसे ही कसमसाये जा रही थी।
मै अब आगे कुछ करता की तभी बाहर से किसी की आहट सी सुनाई दी, शायद ये मेरी भाभी थी। मुझसे छुङाने के लिये सुमन दीदी तो जैसे अब छटपटा ही पङी।
मैं भी नहीं चाहता था की सुमन दीदी को या मेरी भाभी को कुछ पता चले इसलिये सुमन दीदी को छोड़कर मै अब उनसे अलग हो गया। और सुमन दीदी भी मुझसे छुटते ही जल्दी से ड्राईंगरूम से बाहर निकल गई।
अब सुमन दीदी तो चली गयी मगर मेरे अन्दर हवस का एक तूफान सा छोङ गयी जिसे उस रात मैंने दो बार मुठ मारकर शाँत किया तब जाके कही मुझे नींद आ सकी।

